राजव्यवस्था व स्वामित्व, कथा के संदर्भ में' रामनाथ शिवेंद्र this image is mine and created by me कानून, राजनीति और संपत्ति के अर्न्तसंबन्धों को आज तक मानवीय वुद्धि ने विविध तरीकों से समझने का प्रयास किया है, अनेक चर्चित अचर्चित किताबें प्रकाशित की हैं फिर भी इनके अर्न्तसंबधों की कोई सर्वस्वीकार्य धारा नहीं बहायी जा सकी है। सारी सामाजिक व्यवस्था तो तभी से गड़बड़ाने लगी जब संपत्ति के स्वामित्व के अगल बगल धर्म, राजनीति तथा कानूनों को घुमाया जाने लगा और संपत्ति को स्वामित्व की धारा में ला कर, उसे कानूनी बना कर, समाज के अस्तित्व को को डुबो दिया गया। हमें इस गड़बड़ी को कथाओं के सृजन में अनिवार्यरूप से लाने का प्रयास करना चाहिए। मुझे जान पड़ता है कि भूमि, संपत्ति और स्त्री के सवाल जो आज के समय में जितने जरूरी हैं उतने पहले भी थे, पर इस विमर्श से वौद्धिक भागते हुए जान पड़ते हैं। आज का वैश्वीकरण, उदारवाद और बाजारवाद या वैश्विक पूंजीवाद की कूटरचना उन्हें विमर्श करने ही नहीं देगी। मेरा मानना है ऐसा है भी। हम मूलरूप से समस्याओं की जड़ों तक पहुंचने वाले लोग हैं ही ...